चंद्रमोहन, (स्वतंत्र पत्रकार), दिल्ली-एनसीआर। दिल्ली से सटे गुरुग्राम को देश की कॉरपोरेट राजधानी भी कहा जाता है, लेकिन मानसून आते ही उसका एक दूसरा चेहरा सामने आ जाता है। जलमग्न सड़कें, डूबते अंडरपास, घंटों का ट्रैफिक जाम और दफ्तर पहुंचने के लिए जूझते हजारों-लाखों लोग। इस साल भी बारिश ने शहर की चमकदार तस्वीर के पीछे छिपी शहरी नियोजन की इस कमजोरी को जलभराव से जमा पानी की सतह पर ला दिया। यही वजह रही कि हरियाणा विधानसभा के मानसून सत्र में गुरुग्राम का जलभराव विपक्ष के प्रमुख सवालों में शामिल रहा। सत्र शुरू होने से पहले ही कांग्रेस ने इसे प्रमुख मुद्दा बनाने की घोषणा कर दी थी। इस बार सवाल केवल इतना नहीं था कि बारिश में गुरुग्राम क्यों डूबता है? असली सवाल यह है कि लगातार विकसित होते इस एनसीआर शहर में इतने वर्षों बाद भी बारिश का पानी निकालने की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई?
बारिश नहीं, शहर की प्लानिंग कटघरे में
गुरुग्राम में जलभराव अब कोई अप्रत्याशित घटना नहीं रह गई है। हर मानसून के साथ वही कहानी दोहराती है। भारी बारिश, जलभराव, ट्रैफिक जाम और फिर पंप लगाकर पानी निकालने की कवायद। इस बार भी अगस्त की बारिश के बाद शहर के कई हिस्सों में जलभराव ने यातायात को बुरी तरह प्रभावित किया। विधानसभा सत्र से ठीक पहले और सत्र के दौरान गुरुग्राम को लेकर राजनीतिक बहस इसलिए और तीखी हुई क्योंकि यह समस्या किसी एक बारिश या एक विभाग की विफलता जैसी नहीं दिखती। दिलचस्प बात यह है कि सरकारी एजेंसियों की अपनी पड़ताल भी समस्या की जटिलता की ओर इशारा करती है। नगर निगम ने इस मानसून 155 जलभराव वाले हॉटस्पॉट चिन्हित किए हैं। अवैध रैंप, अतिक्रमण और संकरे होते रास्तों को भी पानी के बहाव में बाधा माना गया है। यानी समस्या केवल बादलों से नहीं है। समस्या उस शहर की भी है जो अपनी प्राकृतिक जलनिकासी को पीछे छोड़कर लगातार कंक्रीट में बदलता गया। गुरुग्राम के सांसद और केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने भी हालिया जलभराव के लिए वर्षों के निर्माण से बाधित प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम को बड़ी वजह बताया और कहा कि केवल पंपों से पानी निकालना स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
सरकार का जवाब: अगली बारिश तक इंतजार नहीं
सरकार ने भी समस्या को हल्का नहीं माना है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने गुरुग्राम के लिए 100 रेनवॉटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाने की योजना बताई है। लक्ष्य अगले मानसून से पहले इन संरचनाओं के जरिए करीब 25–30 करोड़ लीटर बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने का है। इसके साथ अरावली में चेक डैम, ड्रेन की सफाई की कैमरा आधारित निगरानी और गुरुग्राम के निचले इलाकों से अतिरिक्त पानी को नूंह के रास्ते यमुना की ओर ले जाने की दीर्घकालिक संभावना का अध्ययन भी प्रस्तावित है। यह कदम महत्वपूर्ण है लेकिन गुरुग्राम के सामने असली चुनौती यह है कि क्या अगले मानसून तक योजना कागज से जमीन पर पहुंचेगी? दरअसल, गुरुग्राम का अनुभव बताता है कि मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने के दावे हर साल होते हैं, लेकिन भारी बारिश होते ही व्यवस्था की असल परीक्षा शुरू हो जाती है।
दिल्ली-एनसीआर के लिए गुरुग्राम की चेतावनी
ध्यान देना होगा कि गुरुग्राम का संकट सिर्फ हरियाणा का स्थानीय मुद्दा नहीं है। दिल्ली से रोजाना आने-जाने वाले लाखों लोगों, कॉरपोरेट कंपनियों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और पूरे एनसीआर की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इस शहर से जुड़ा है। गुरुग्राम की सड़कें डूबती हैं तो दिल्ली प्रभावित होती है। एक्सप्रेसवे पर जाम लगता है तो उसका असर पूरे एनसीआर के यातायात पर पड़ता है। इसलिए गुरुग्राम का जलभराव वास्तव में दिल्ली-एनसीआर के शहरी नियोजन का साझा सवाल है।
और यही इस विधानसभा सत्र से निकलने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात है। गुरुग्राम को सिर्फ बारिश से नहीं, गलत और बिखरे हुए शहरी नियोजन से बचाने की जरूरत है।
एक नजर में: विधानसभा सत्र का बाकी लेखा-जोखा
गुरुग्राम के जलभराव के अलावा मानसून सत्र में रोजगार, कानून-व्यवस्था, सफाई कर्मचारियों की हड़ताल, बिजली वितरण, किसानों का मुआवजा और हरियाणा कौशल रोजगार निगम जैसे मुद्दे भी प्रमुख रहे। कांग्रेस ने सत्र से पहले ही इन मुद्दों को उठाने की रणनीति बनाई थी। सत्र की शुरुआत राजनीतिक टकराव से हुई और कांग्रेस विधायकों के जोरदार विरोध तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हंगामे के बाद कार्यवाही बाधित हुई। इसके बावजूद विधायी कामकाज हुआ। विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार सत्र में 14 सरकारी विधेयक सूचीबद्ध रहे और अंतिम दिन 11 विधेयक चर्चा के बाद पारित किए गए। इनमें विनियोग, अल्पसंख्यक आयोग, ग्राम शामलात भूमि, स्थानीय लेखा परीक्षा, निजी विश्वविद्यालय, महिला आयोग, जीएसटी, पंचायती राज, भौतिक चिकित्सा परिषद, विधि अधिकारियों और राइट टू बिज़नेस से जुड़े विधेयक शामिल हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सत्र को सकारात्मक और सार्थक बताया। जबकि विपक्ष का आरोप रहा कि सरकार असहज सवालों से बचती रही। सत्र की तीन बैठकों और करीब 16 घंटे की कार्यवाही के बाद हरियाणा विधानसभा ने कानून तो बनाए, सवाल भी उठे, लेकिन गुरुग्राम का जलभराव एक बार फिर यही पूछता हुआ बाहर रह गया कि अगली बारिश में क्या बदलेगा?

