एआई ब्यूरो, देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान से उठी ‘शुद्धिकरण’ की राजनीतिक चिंगारी अब उत्तराखंड की सीमाएं पार कर कर्नाटक तक पहुंच गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद कथित तौर पर किए गए शुद्धिकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद पहले भाजपा-कांग्रेस की राजनीतिक बयानबाजी में बदला, फिर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर और अब बेंगलुरु में उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट समेत अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ जीरो एफआईआर ने इसे सीधे ‘FIR बनाम FIR’ की सियासी लड़ाई में बदल दिया है। सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि जिस विवाद में कांग्रेस शुरुआत से भाजपा पर दलित अस्मिता के अपमान का आरोप लगाती रही, उसी विवाद में राहुल गांधी पर मुकदमा दर्ज होने के कुछ ही दिनों बाद कर्नाटक में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ भी मामला दर्ज हो गया। अब दोनों दल अपने-अपने मुकदमों को राजनीतिक और वैधानिक जवाब के रूप में पेश कर रहे हैं।
8 अगस्त की रैली के बाद शुरू हुआ विवाद
विवाद की शुरुआत 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद हुई। कांग्रेस का आरोप है कि खड़गे की सभा के बाद उसी स्थल पर कथित रूप से ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान कराया गया। कांग्रेस ने इसे इस तथ्य से जोड़कर देखा कि खड़गे अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं और इसे दलित सम्मान तथा छुआछूत के सवाल से जोड़ा। राहुल गांधी ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर भाजपा को घेरने की कोशिश की। जबकि खड़गे ने पहले ही 13 अगस्त को इस मुद्दे को संसद में भी उठाया था। उन्होंने राज्यसभा में मामला उठाने के बाद सभापति के स्तर पर चिंता जताए जाने और भाजपा के तत्कालीन आश्वासन के बावजूद कार्रवाई न होने पर नेता सदन जेपी नड्डा को पत्र भी लिखा है। पत्र में खड़गे का कहना था कि घटना के 24 दिन बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। इसके बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को उत्तराखंड से बाहर राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश तेज कर दी। जाहिर है उत्तराखंड के साथ ही पंजाब और उत्तरप्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं और यहां दलित वोटर निर्णायक भूमिका में हैं।
राहुल गांधी की एंट्री और भाजपा का पलटवार
दरअसल 29 अगस्त को राहुल गांधी ने शुद्धिकरण की घटना को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तराखंड सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने इसे छुआछूत से जोड़ते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की। राहुल ने यह भी सवाल उठाया कि जब उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट कथित रूप से इस घटना का बचाव कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री इस पर चुप क्यों हैं।
स्वाभाविक ही है कि यहीं से इस विवाद ने नया राजनीतिक मोड़ लिया। 30 अगस्त को हल्द्वानी में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक शिकायत अमित कुमार नामक व्यक्ति ने की, जो अनुसूचित जाति समुदाय से हैं और कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम में शामिल होने वालों में बताए गए हैं। मामले में एससी/एसटी एक्ट की धाराएं 3(1)(आर) और 3(1)(यू) तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 लगाई गई है।
कांग्रेस ने इसे मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने और राहुल गांधी की आवाज दबाने की कोशिश बताया, जबकि भाजपा की तरफ से तर्क दिया गया कि राहुल गांधी ने एक धार्मिक अनुष्ठान को जातीय रंग देकर सामाजिक विद्वेष फैलाने की कोशिश की। यानी जिस मुद्दे पर कांग्रेस ‘दलित सम्मान’ की लड़ाई लड़ रही थी, भाजपा ने उसी को ‘धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव’ के सवाल में बदलने की कोशिश की।
फिर बेंगलुरु में खुला दूसरा मोर्चा
राहुल गांधी पर एफआईआर के बाद विवाद थमा नहीं, बल्कि पलटकर कर्नाटक पहुंच गया। बेंगलुरु के विधान सौधा थाने में कांग्रेस के आदिवासी प्रकोष्ठ के पूर्व पदाधिकारी टी.आर. रामप्पा की शिकायत पर उत्तराखंड भाजपा नेताओं और अन्य लोगों के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 8 अगस्त को खड़गे की सभा के बाद 10 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कथित शुद्धिकरण कराया गया और इसका उद्देश्य खड़गे की अनुसूचित जाति पहचान के कारण स्थल को ‘अपवित्र’ मानने का जातिगत संदेश देना था। इस शिकायत में उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का नाम भी आया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने मीडिया में दिए बयानों के जरिए कथित शुद्धिकरण का बचाव किया और इस तरह उस संदेश को मजबूत किया। मामले में एससी/एसटी कानून सहित संबंधित कानूनी प्रावधान लगाए गए हैं और बेंगलुरु पुलिस मामले को जांच के लिए उत्तराखंड भेजने की प्रक्रिया में है।
आखिर जीरो एफआईआर क्या बदलती है?
राजनीतिक तौर पर यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है कि मामला बेंगलुरु में दर्ज हुआ, जबकि कथित घटना हल्द्वानी की है। जीरो एफआईआर का उद्देश्य ही यह है कि घटना की स्थानीय सीमा या पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र की बाध्यता के बिना शिकायत दर्ज की जा सके और बाद में उसे संबंधित क्षेत्र की पुलिस को जांच के लिए भेजा जा सके। इसलिए बेंगलुरु में एफआईआर दर्ज होना अपने आप में यह नहीं बताता कि मामले की जांच कर्नाटक में ही चलेगी। लेकिन राजनीतिक संदेश बिल्कुल साफ है कि कांग्रेस ने उत्तराखंड में दर्ज राहुल गांधी की एफआईआर का जवाब कर्नाटक में भाजपा के शीर्ष राज्य नेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के रूप में दिया है।
महेंद्र भट्ट के सुर बदले, सवाल और गहरा गया
पूरे घटनाक्रम का एक और अहम पहलू महेंद्र भट्ट का बदला हुआ रुख है। 25 अगस्त के आसपास दिए गए उनके बयान को मीडिया रिपोर्टों में शुद्धिकरण के बचाव के तौर पर पेश किया गया था। बाद में बेंगलुरु में जीरो एफआईआर दर्ज होने के अगले दिन भट्ट ने इससे दूरी बनाते हुए कहा कि भाजपा का इस पूरे मामले से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके किसी बयान या भाजपा की किसी प्रेस विज्ञप्ति में ऐसा कुछ कहा गया है तो सवाल उठना चाहिए।
भट्ट का नया तर्क यह है कि मैदान में गंदगी रह गई थी और अगर वहां हवन किया गया तो इसमें क्या गलत है। उन्होंने इसे कांग्रेस द्वारा सामाजिक विद्वेष फैलाने की कोशिश बताया। यहीं विपक्ष को राजनीतिक हथियार मिल गया है। कांग्रेस का सवाल है कि अगर भाजपा का शुद्धिकरण से कोई लेना-देना नहीं था तो प्रदेश अध्यक्ष ने पहले उसका बचाव क्यों किया? यानी अब लड़ाई केवल इस बात पर नहीं है कि मैदान में क्या हुआ था, बल्कि यह भी है कि किसने उसका समर्थन किया और बाद में किसने अपने बयान से दूरी बनाई।
कांग्रेस का हमला: ‘कानून के हाथ लंबे हैं
बेंगलुरु में एफआईआर के बाद कांग्रेस ने इसे उत्तराखंड में राहुल गांधी पर हुई कार्रवाई का जवाब माना है। उत्तराखंड कांग्रेस की ओर से कहा गया कि राज्य में भाजपा सरकार ने राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया, लेकिन कानून की पहुंच उत्तराखंड की सीमा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के लिए यह मामला अब केवल खड़गे या राहुल गांधी का नहीं रह गया है। पार्टी इसे दलित सम्मान, संविधान और भाजपा के कथित दोहरे रवैये से जोड़ रही है। इसी मुद्दे पर कांग्रेस ने 7 सितंबर को देहरादून में मुख्यमंत्री आवास घेराव कर विरोध प्रदर्शन किया।
भाजपा का बचाव: कांग्रेस मुद्दे को राजनीतिक बना रही
भाजपा का मूल बचाव यह है कि कांग्रेस कथित शुद्धिकरण के मुद्दे को जरूरत से ज्यादा तूल दे रही है और धार्मिक अनुष्ठान को जातिगत विवाद का रूप दिया जा रहा है। भाजपा की तरफ से यह भी कहा गया कि आयोजन किसी निजी संस्था या स्थानीय स्तर की गतिविधि थी और पार्टी को उससे जोड़ना गलत है। महेंद्र भट्ट ने भी अब इसी लाइन पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। जाहिर है कि भाजपा अब दो मोर्चों पर लड़ रही है, एक तरफ राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामले को सही ठहराना और दूसरी तरफ अपने प्रदेश अध्यक्ष को शुद्धिकरण की कथित घटना से संस्थागत तौर पर अलग करना।
कर्नाटक ने विवाद को राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचाया
बेंगलुरु की एफआईआर के बाद मामला उत्तराखंड की आंतरिक राजनीति से निकलकर कांग्रेस-भाजपा की राष्ट्रीय लड़ाई का हिस्सा बन गया है। कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे ने भी इस मामले को लेकर भाजपा पर हमला बोला और सवाल उठाया कि उत्तराखंड सरकार को पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी। इसका राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि एक तरफ कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के क्षेत्र में उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज हुई है और दूसरी तरफ उत्तराखंड में कांग्रेस के सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे राहुल गांधी पर भाजपा शासित राज्य में एफआईआर हुई है। दोनों राज्यों की राजनीति एक ही मुकदमे के दो सिरों से जुड़ गई है।
स्वाभाविक है कि अब असली लड़ाई एफआईआर की नहीं, नैरेटिव की है। हल्द्वानी का ‘शुद्धिकरण’ विवाद अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है और राजनीतिक नैरेटिव अपनी जगह। कांग्रेस इसे दलित सम्मान बनाम भाजपा की कथित जातिवादी मानसिकता के रूप में पेश कर रही है। भाजपा इसे धार्मिक आस्था को राजनीतिक हथियार बनाने और राहुल गांधी द्वारा सामाजिक विद्वेष फैलाने के आरोप से जोड़ रही है। राहुल गांधी पर एफआईआर के बाद भाजपा को लगा कि उसने कांग्रेस के हमले का कानूनी जवाब दे दिया है। लेकिन बेंगलुरु में महेंद्र भट्ट के खिलाफ जीरो एफआईआर ने उसी तर्क को उलटकर कांग्रेस के हाथ में दे दिया। अब दोनों पक्षों के पास अपना-अपना मुकदमा है, अपना-अपना आरोपी है और अपनी-अपनी राजनीतिक व्याख्या।
इसलिए हल्द्वानी का सवाल अब यह नहीं रह गया कि रामलीला मैदान का शुद्धिकरण हुआ या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति 2027 से पहले ‘FIR बनाम FIR’ की ऐसी लड़ाई में प्रवेश कर चुकी है, जिसमें कानून की धाराएं राजनीतिक नैरेटिव का नया हथियार बन रही हैं? और शायद इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस घटना ने दलित सम्मान और छुआछूत के सवाल को राजनीति के केंद्र में ला दिया था, वही घटना अब भाजपा और कांग्रेस के बीच कानूनी जवाबी कार्रवाई की नई पटकथा लिख रही है।

