संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत का ढहना सिर्फ एक भवन का गिरना नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था के चरमराने का संकेत है, जिस पर शहरों में रहने वाले लाखों विद्यार्थियों, कामगारों और आम नागरिकों की सुरक्षा निर्भर है। सात लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने जिस तरह नगर निगम के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं, उसने बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। सवाल अब यह नहीं रह गया कि इमारत का मालिक दोषी है या नहीं। असली सवाल यह है कि जब एक खतरनाक इमारत विद्यार्थियों के रहने की जगह बन रही थी, तब निगरानी करने वाली पूरी व्यवस्था कहां थी?
सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए पीजी और किराये के आवास का बड़ा केंद्र है। विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या के मुकाबले आधिकारिक हॉस्टल क्षमता बेहद सीमित है। नतीजा यह है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी, किराये के मकानों और अनौपचारिक छात्र आवासों पर निर्भर हैं। यही वह जगह है जहां शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी परिसर की चारदीवारी से बाहर निकल जाती है।
चिंताजनक बात यह है कि दिल्ली में बदइंतजामी और लापरवाही का यह कोई अकेला संकेत नहीं है। इसी वर्ष जून में राष्ट्रीय राजधानी में मालवीय नगर के एक होटल-कम-रेस्तरां में लगी भीषण आग ने 21 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। कई लोग इमारत के भीतर फंस गए और कुछ को अपनी जान बचाने के लिए ऊंची मंजिलों से कूदना पड़ा। उस हादसे के बाद भी सवाल यही था कि फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र, निरीक्षण और भवन के वास्तविक इस्तेमाल के बीच इतना बड़ा अंतर कैसे पैदा हुआ? सवाल उठा कि गली और चौक-चौराहों पर घूमती दिल्ली पुलिस इस तरह की गतिविधि से कैसे अनजान बनी रही?
ज़्यादा पीछे न जाते हुए अगर देश की राजधानी दिल्ली की इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो तस्वीर भयावह है। एक जगह इमारत गिरती है, दूसरी जगह आग में लोग झुलस कर दम तोड़ देते हैं। लेकिन दोनों के पीछे एक साझा समस्या दिखाई देती है कि सुरक्षा नियमों का होना और उनका प्रभावी ढंग से लागू होना दो अलग-अलग चीजें हैं।
दरअसल, यही वह अहम बिंदु है जिस पर सरकारों, नगर निकायों, विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं को आत्ममंथन करना होगा।
सवाल है कि आखिर हर बार कोई न कोई हादसा होने के बाद ही ऑडिट का राग क्यों अलापा जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सत्य निकेतन मामले में एमसीडी से उच्चस्तरीय जांच के साथ पीजी आवासों के सुरक्षा ऑडिट की दिशा में कदम उठाने को कहा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं की जा सकती है।
यह सवाल असहज जरूर है, लेकिन जरूरी भी है कि क्या हमारे शहरों में सुरक्षा ऑडिट तब होता है जब हादसा हो जाता है? अगर जवाब हां है तो हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था प्रतिक्रियात्मक है, न कि निवारक।
हमें हर बार किसी सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, मालवीय नगर या किसी दूसरे शहर के हादसे का इंतजार नहीं करना चाहिए। विद्यार्थियों के रहने, पढ़ने और आने-जाने वाली हर ऐसी जगह का जोखिम मूल्यांकन पहले होना चाहिए। विशेष रूप से वे इलाके जहां हजारों-लाखों छात्र एक साथ रहते हैं, पीजी, हॉस्टल, कोचिंग हब, निजी छात्रावास, लॉज और किराये के मकान आदि में, उन्हें केवल आवासीय या व्यावसायिक संपत्ति मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।
सवाल यह भी है कि आखिर दिल्ली से यूपी-उत्तराखंड और अन्य राज्यों को क्या सीखना चाहिए? यह सवाल उत्तराखंड के लिए और भी महत्वपूर्ण है। देहरादून आज सिर्फ राज्य की राजधानी (अस्थाई) नहीं, बल्कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा हब बन चुका है। हर साल उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल और दूसरे राज्यों से हजारों विद्यार्थी यहां पढ़ने आते हैं। हर साल खुलते निजी विश्वविद्यालय तस्दीक करते हैं कि आने वाले सालों में देहरादून और आसपास के शहरों में छात्रों का दबाव और बढ़ेगा। लेकिन क्या बेसिक सुविधाओं से लेकर सुरक्षात्मक उपायों पर हमारा शासन-प्रशान संजीदगी बरतेगा।
दरअसल आज भी देहरादून जैसे एजुकेशन हब शहरों में पढ़ रहे विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा अपने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के आधिकारिक हॉस्टलों में नहीं रहता। वे निजी पीजी, छात्रावासों और किराये के मकानों में रहते हैं। इसलिए सुरक्षा का सवाल केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रह सकता। अच्छी बात यह है कि उत्तराखंड सरकार ने जून में लखनऊ के कोचिंग सेंटर अग्निकांड के बाद अस्पतालों, कोचिंग संस्थानों, सरकारी कार्यालयों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अन्य सार्वजनिक उपयोग की इमारतों के फायर सेफ्टी ऑडिट के निर्देश दिए थे। लेकिन अब असली परीक्षा निर्देश जारी करने की नहीं, उनके अनुपालन और निरंतर निगरानी की है।
प्रशासन चाहे तो इन सवालों के जवाब अपने आप से माँग सकता है। कितने कोचिंग सेंटरों का ऑडिट हुआ? कितने पीजी और निजी छात्रावासों की जांच हुई? कितनी इमारतों में फायर एग्जिट वास्तव में काम कर रहे हैं? कितनी इमारतों में आपातकालीन सीढ़ियां हैं?
कितने भवनों में विद्युत वायरिंग की जांच हुई? कितने बेसमेंट वास्तव में स्वीकृत उपयोग में हैं? कितने भवनों में क्षमता से अधिक छात्र रह रहे हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन भवनों को असुरक्षित पाया गया, उनके खिलाफ वास्तव में क्या कार्रवाई हुई?
स्वाभाविक है कि है इन सवालों के जवाब सार्वजनिक भी होने चाहिए।
ध्यान रहे कि सिर्फ फायर एनओसी काफी नहीं है। हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम सुरक्षा को अक्सर एक प्रमाणपत्र में समेट देते हैं। भवन के बाहर फायर एनओसी लगी है तो मान लिया जाता है कि सब सुरक्षित है।
लेकिन सुरक्षा प्रमाणपत्र का अर्थ तभी है जब आपात स्थिति में उसका हर प्रावधान जमीन पर मौजूद हो। एक वास्तविक सुरक्षा ऑडिट में कम-से-कम पांच स्तरों को देखा जाना चाहिए, यथा- भवन की संरचनात्मक मजबूती, अग्नि सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा, आपदा एवं निकासी व्यवस्था और मानव सुरक्षा। इसके साथ बेसमेंट, गैस पाइपलाइन, जनरेटर, लिफ्ट, आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था, फायर अलार्म, अग्निशमन उपकरण, निकासी मार्ग और भवन की वास्तविक क्षमता की भी जांच जरूरी है।
विद्यालयों के लिए केंद्र सरकार की पीएम श्री रूपरेखा में भी वैधानिक सुरक्षा उपायों, फायर सेफ्टी और डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान को संस्थागत सुरक्षा का हिस्सा माना गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों के संदर्भ में भी यूजीसी ने सुरक्षित और सुलभ परिसर, हॉस्टल तथा संस्थागत सुरक्षा को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया है।
फिर सवाल यह है कि कागज पर मौजूद सुरक्षा मानकों की जमीन पर स्वतंत्र जांच कौन करेगा?
सत्य निकेतन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा विश्वविद्यालय की भूमिका पर सवाल उठाना इसी व्यापक विमर्श की ओर संकेत करता है। अगर विश्वविद्यालय अपने छात्रों के लिए पर्याप्त सुरक्षित आवास उपलब्ध नहीं करा पा रहा और छात्र मजबूरी में अनियमित निजी पीजी में रहने को विवश हैं, तो क्या विश्वविद्यालय और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी केवल परिसर की सीमा तक है? यह सवाल केवल दिल्ली विश्वविद्यालय का नहीं है। देश के हर विश्वविद्यालय, कॉलेज और बड़े शैक्षणिक शहर को अपने विद्यार्थियों के लिए एक स्टूडेंट सेफ्टी मैप तैयार करना चाहिए।
कहां छात्र रहते हैं? कितने पीजी पंजीकृत हैं? कितने भवनों में फायर और स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ है? कितने भवनों की क्षमता कितनी है और वहां वास्तव में कितने विद्यार्थी रह रहे हैं? आपातकाल में सबसे नजदीकी अस्पताल, फायर स्टेशन और पुलिस सहायता कितनी दूर है? यह जानकारी प्रशासन, विश्वविद्यालय और छात्रों—तीनों के लिए सार्वजनिक होनी चाहिए।
क्या ऑडिट एक बार के बजाय हर साल नहीं होना चाहिए? सबसे जरूरी बदलाव यह होना चाहिए कि सुरक्षा ऑडिट को हादसे के बाद की कार्रवाई न माना जाए। जिस तरह शैक्षणिक संस्थानों में शैक्षणिक कैलेंडर, परीक्षा और परिणाम हर साल होते हैं, उसी तरह सुरक्षा ऑडिट भी वार्षिक अनिवार्यता बने। और सिर्फ निरीक्षण नहीं बल्कि उसकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक हो। ग्रीन, येलो और रेड श्रेणी बनाई जा सकती है।
ग्रीन—सुरक्षित।येलो—सुधार की जरूरत। रेड—तत्काल खाली कराने या संचालन रोकने योग्य। ऐसी व्यवस्था से अभिभावकों और विद्यार्थियों को भी प्रवेश या आवास चुनने से पहले वास्तविक जानकारी मिलेगी।
अब समय आ गया है कि सरकारों को अपने ‘जीरो टॉलरेंस’ नारे की परीक्षा देनी होगी। हर हादसे के बाद मुआवजा, जांच और कुछ गिरफ्तारियां व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी नहीं करतीं। व्यवस्था की असली सफलता यह है कि हादसा होने ही न दिया जाए। सत्य निकेतन की इमारत अगर पहले से जोखिमपूर्ण थी तो सवाल है कि उसकी पहचान पहले क्यों नहीं हुई। मालवीय नगर की इमारत में अगर अग्नि सुरक्षा को लेकर कमियां थीं तो वे त्रासदी से पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं। यही सवाल देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, ऋषिकेश और देश के तमाम शिक्षा केंद्रों से भी पूछा जाना चाहिए। उत्तराखंड ने फायर सेफ्टी ऑडिट के निर्देश देकर शुरुआत जरूर की है। अब जरूरत है कि सरकार यह बताए कि कितने संस्थानों का ऑडिट पूरा हुआ, कितनी कमियां मिलीं और कितनी कमियों को दूर कराया गया।
आखिर विद्यार्थियों की सुरक्षा सरकार, प्रशासन, नगर निकाय, विश्वविद्यालय, निजी संस्थानों और भवन मालिक यानी सभी की साझा जवाबदेही है। दिल्ली का सत्य निकेतन हमें एक बेहद कड़वा सबक दे गया है कि इमारतें अचानक नहीं गिरतीं, व्यवस्था पहले से दरक रही होती है। लिहाजा जरूरत सिर्फ मलबा हटाने की नहीं है। जरूरत उस व्यवस्था के मलबे को हटाने की है, जो हादसे से पहले खतरे को देखने से इनकार करती है।
अगर दिल्ली की इस त्रासदी के बाद भी देश के दूसरे शिक्षा केंद्रों में सुरक्षा ऑडिट केवल फाइलों तक सीमित रह गया, तो अगला सवाल यह नहीं होगा कि हादसा कहां हुआ।
सवाल यह होगा कि हादसे की अगली खबर आने का इंतजार किस शहर में हो रहा है?

