धर्म-संस्कृति : दो धड़ों में बंटा हिमालयी महाकुंभ

उत्तराखंड की लोक आस्था के सबसे बड़े प्रतीक और हर 12 साल में आयोजित होने वाले ‘हिमालयी महाकुंभ’ को लेकर चल रहा विवाद आखिरकार धरातल पर तब्दील हो गया है।

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देहरादून। उत्तराखंड की लोक आस्था के सबसे बड़े प्रतीक और हर 12 साल में आयोजित होने वाले ‘हिमालयी महाकुंभ’ को लेकर चल रहा विवाद आखिरकार धरातल पर तब्दील हो गया है। ऐतिहासिक स्टार्टिंग पॉइंट और तारीखों के टकराव के बीच, पांच सितंबर (शनिवार) से चमोली जिले के नंदानगर (नंदप्रयाग) स्थित सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से ‘नंदा देवी बड़ी जात यात्रा’ का विधिवत शुभारंभ हो गया है। बारिश के बावजूद हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं के जयकारों के साथ मां नंदा की डोलियां कैलाश धाम के लिए रवाना हो गईं। यह यात्रा सरकारी स्तर के बजाय कुरुड़ आयोजन समिति और स्थानीय हक-हकूकधारियों के नेतृत्व में निजी तौर पर निकाली जा रही है, क्योंकि नौटी (कर्णप्रयाग) की मुख्य राजजात समिति ने इसे अगले वर्ष यानी 2027 तक के लिए टाल दिया है।

दरअसल, इस ऐतिहासिक विवाद की शुरुआत तब हुई, जब नौटी की मुख्य नंदा राजजात आयोजन समिति ने तिथियों का आकलन करते हुए कहा कि इस वर्ष अगस्त-सितंबर (भाद्रपद) महीने में ‘मलमास’ (पुरुषोत्तम मास) पड़ रहा है। समिति के अनुसार, इस वजह से उच्च हिमालयी क्षेत्र होमकुंड तक पहुंचने की नवमी तिथि 20 सितंबर के आसपास आ रही है, जब पहाड़ों पर मौसम और सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक परिस्थितियां बन जाती हैं। इसी आधार पर नौटी समिति ने राजकीय सहयोग से होने वाली मूल ‘नंदा राजजात यात्रा’ को स्थगित कर वर्ष 2027 में आयोजित करने का औपचारिक निर्णय ले लिया। इसके विपरीत, सिद्धपीठ कुरुड़ के हक-हकूकधारियों और गौड़ ब्राह्मणों ने इस फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया।

कुरुड़ पक्ष का तर्क है कि शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों के लिए यह समय पूरी तरह अनुकूल है। उनका आरोप है कि समय के साथ यात्रा के आयोजन में कांसुआ के कुंवरों और नौटी गांव का वर्चस्व बढ़ गया है और सदियों से चली आ रही कुरुड़ की मुख्य भूमिका एवं धार्मिक परंपराओं की जानबूझकर उपेक्षा की जा रही है। कुरुड़ महापंचायत ने कड़ा रुख अपनाते हुए तय 12वें वर्ष (2026) में ही ‘बड़ी जात’ निकालने का ऐलान किया था। जिस क्रम में शनिवार को यात्रा का शुभारंभ हुआ।

Nanda chosing khadu

कैलाश विदा हुईं उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा

नंदानगर (चमोली)। बारिश की हल्की फुहारें पड़ रही थीं। कुरुड़ गांव का सिद्धपीठ मां नंदा देवी मंदिर हजारों श्रद्धालुओं से भरा हुआ था। मंदिर परिसर में ढोल-दमाऊं की थाप गूंज रही थी और महिलाओं के कंठ से निकलते जागर वातावरण को भक्ति से भर रहे थे। तभी वह क्षण आया, जिसका हजारों श्रद्धालु बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मां नंदा देवी की डोली मंदिर के सभा मंडप से बाहर निकलीं और पूरा क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा, लेकिन यह केवल धार्मिक यात्रा की शुरुआत नहीं थी। यह एक ऐसी विदाई थी, जिसमें आस्था के साथ भावनाएं भी बह रही थीं। कई महिलाओं की आंखों से आंसू छलक पड़े। मानो वे किसी देवी को नहीं, बल्कि अपनी बेटी को उसके ससुराल विदा कर रही हों। उत्तराखंड की लोक परंपराओं में मां नंदा देवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि घर-घर की बेटी और बहन मानी जाती हैं। यही कारण है कि उनकी कैलाश यात्रा को आज भी एक बेटी की विदाई के रूप में देखा जाता है। हर बार जब नंदा की डोली कैलाश के लिए निकलती है, तो पहाड़ का समाज उसी भाव से उसे विदा करता है, जैसे कोई पिता अपनी बेटी को उसके नए घर के लिए विदा करता है।

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव

हिमालय की अधिष्ठात्री मानी जाने वाली मां नंदा देवी की बड़ी जात उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में शामिल है। यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। लोककथाओं और मान्यताओं के अनुसार मां नंदा, भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं और कैलाश उनका ससुराल है। इसलिए समय-समय पर उन्हें पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ कैलाश विदा किया जाता है। कुरुड़ स्थित सिद्धपीठ से शुरू हुई इस वर्ष की बड़ी जात भी उसी परंपरा का निर्वहन है। यात्रा के शुभारंभ के साथ ही पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बन गया है। गांव-गांव से आए श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन किए और डोलियों के साथ अगले पड़ावों की ओर प्रस्थान किया।

जागरों में झलका बेटी की विदाई का दर्द

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में जागर केवल गीत नहीं, बल्कि लोकभावनाओं की अभिव्यक्ति हैं। मां नंदा की विदाई के समय महिलाओं ने जागरों के माध्यम से वही भाव व्यक्त किए, जो किसी बेटी की विदाई के समय घर-आंगन में दिखाई देते हैं। कई वृद्ध महिलाओं की आंखें नम थीं। युवतियां और धियाणियां पारंपरिक वेशभूषा में मां के स्वागत और विदाई के लिए दूर-दूर से पहुंची थीं। बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। जागरों और जयकारों के बीच पूरा कुरुड़ गांव मानो एक विशाल धार्मिक परिवार में बदल गया।

चौसिंग्या खाड़ू से शुरू हुई यात्रा की धार्मिक प्रक्रिया

मां नंदा की बड़ी जात का धार्मिक क्रम कई दिन पहले ही शुरू हो गया था। गुरुवार को सुंग गांव से चौसिंग्या खाड़ू (चार सींग वाला मेढ़ा) जयकारों के बीच कुरुड़ पहुंचा। लोक परंपराओं में चौसिंग्या खाड़ू को शुभ संकेत माना जाता है और बड़ी जात से उसका विशेष संबंध है। विदाई अनुष्ठान के दौरान मां नंदा के अवतारी पुरुष मुंशी चंद्र गौड़ पर देवी अवतरित हुईं। उन्होंने बड़ी जात की सफलता और क्षेत्र की खुशहाली का आशीर्वाद दिया। इस दृश्य को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु मौजूद थे।

500 से अधिक गांवों की आस्था का संगम

नंदा देवी की बड़ी जात केवल एक गांव या क्षेत्र का आयोजन नहीं है। यह सैकड़ों गांवों की साझी आस्था का पर्व है। माना जा रहा है कि इस वर्ष भी करीब 500 से अधिक गांवों के हजारों श्रद्धालु यात्रा में शामिल होंगे। यात्रा मार्ग के गांवों में तैयारियां कई दिनों पहले से शुरू हो चुकी थीं। लोगों ने अपने घरों और पड़ाव स्थलों को सजाया है। धियाणियां अपने मायके लौट रही हैं और पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा वातावरण बना हुआ है।

निर्जन हिमालयी पड़ावों से होकर होमकुंड तक

कुरुड़ से शुरू हुई यह यात्रा हिमालय के दुर्गम और रोमांचक मार्गों से होकर गुजरेगी। वेदनी बुग्याल, रूपकुंड, ज्यूंरागली, शिलासमुद्र और होमकुंड जैसे पड़ाव इस यात्रा को आध्यात्मिक होने के साथ-साथ साहस और धैर्य की परीक्षा भी बनाते हैं। विशेष रूप से गैरोली पातल से शिलासमुद्र तक का मार्ग निर्जन हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरता है। बर्फ, ग्लेशियर, ऊंचे पर्वत और कठिन चढ़ाइयां श्रद्धालुओं को प्रकृति के विराट स्वरूप से साक्षात्कार कराती हैं।

वेदनीकुंड में फिर सजेगा रूपकुंड महोत्सव

नंदा देवी लोकजात के साथ ही वेदनीकुंड में 16 से 18 सितंबर तक तीन दिवसीय रूपकुंड महोत्सव का आयोजन भी होगा। समुद्रतल से लगभग 13,500 फीट की ऊंचाई पर होने वाला यह आयोजन सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बनेगा। इसमें स्थानीय कलाकार, महिला मंगल दल, युवक मंगल दल और छात्र-छात्राएं अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

सिर्फ यात्रा नहीं, उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान

नंदा देवी की बड़ी जात को समझना केवल धार्मिक आयोजन को समझना नहीं है। यह उत्तराखंड के उस भावलोक को समझना है, जहां देवी बेटी बन जाती है, जहां विदाई में आंखें नम हो जाती हैं और जहां हिमालय केवल पर्वत नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा माना जाता है। इसीलिए जब मां नंदा की डोली कैलाश की ओर बढ़ती है, तो उसके साथ केवल श्रद्धालु नहीं चलते। उसके साथ चलती हैं सदियों पुरानी परंपराएं, लोकगीत, जागर, स्मृतियां और पहाड़ के लोगों की अटूट आस्था। 20 सितंबर को होमकुंड में विशेष पूजा-अर्चना के साथ इस वर्ष की बड़ी जात संपन्न होगी। तब तक हिमालय की पगडंडियों पर मां नंदा की यात्रा और उनके जयकारों की गूंज सुनाई देती रहेगी।

अफसर भी पहुंचे मां नंदा के दरबार

कुरुड़ स्थित सिद्धपीठ में आयोजित तीन दिवसीय सांस्कृतिक एवं पर्यटन मेले के समापन अवसर पर जिलाधिकारी चमोली गौरव कुमार और पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार ने मां नंदा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। अधिकारियों ने नंदा जात यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्थाओं का स्थलीय निरीक्षण भी किया। डीएम और एसपी ने मेले व यात्रा मार्ग पर भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा इंतजाम और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करते हुए मौके पर तैनात अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इसके बाद दोनों अधिकारी ग्राम सभा चरबंग के सिलवाणी पहुंचे, जहां जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत बिष्ट के साथ मां नन्दा के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

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