यमकेश्वर: भाजपा और मतदाताओं ने हर बार मातृ शक्ति पर जताया भरोसा
पंकज कुशवाल। इन दिनों महिला आरक्षण को लेकर खूब शोर सुनने को मिल रहा है। मोदी सरकार ने 2029 में महिला आरक्षण लागू करने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन और परिसीमन समेत तीन विधेयक संसद की विशेष बैठक बुलाकर पेश किए। लेकिन विपक्ष ने 17-18 अप्रैल के इस विशेष सत्र में इन विधेयकों को नकार दिया। इसके बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण के लिए महिलाओं को फिलहाल 2034 तक का इंतजार करना पड़ेगा। उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण का रास्ता रोकने को लेकर कांग्रेस और विपक्ष की खूब लानत मलानत की।
हालांकि उत्तराखंड में दो विधानसभा ऐसी हैं जहां के मतदाताओं ने राज्य निर्माण के बाद से लगातार महिला प्रत्याशियों पर ही भरोसा जताया है। प्रदेश की 70 सीटों में से फिलहाल 9 सीटों पर महिला विधायक काबिज हैं। राज्य की एकमात्र सीट यमकेश्वर विधानसभा है जिस पर 2002 के पहले विधानसभा चुनाव के बाद से लेकर अब तक जनता से सिर्फ मातृ शक्ति पर ही भरोसा जताया है। पिछले पांच विधानसभा चुनावों से यह सीट भाजपा के कब्जे में है हालांकि यहां समय समय पर भाजपा ने भी चेहरे बदले लेकिन सिर्फ महिला प्रत्याशी पर ही दांव खेला और जनता ने भी चेहरा बदलने के बावजूद हर बार महिला प्रत्याशी को ही विजयी बनाया।
2002 के पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस सीट से विजया बड़थ्वाल को प्रत्याशी बनाया और जनता ने उन्हें जिताकर विधानसभा भेजा। विजया बड़थ्वाल ने 2007 और 2012 में भी इस सीट पर भाजपा के टिकट से जीत की हैट्रिक लगाई। 2017 में भाजपा ने विजया बड़थ्वाल का टिकट काटकर पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल( रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी भूषण को प्रत्याशी बनाया। अपना पहला चुनाव लड़ रही ऋतु खंडूड़ी भूषण पर यमकेश्वर विधानसभा की जनता ने भरोसा जताया। इस तरह लगातार चौथी बार यमकेश्वर सीट से महिला प्रत्याशी को जीत मिली और वह भी भाजपा के टिकट पर।
2022 में ऋतु खंडूड़ी भूषण ने कोटद्वार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा ने यमकेश्वर से लगातार चुनावों में बागी लड़कर चुनौती पेश कर रही रेनू बिष्ट पर दांव खेला। इस तरह भाजपा ने इस सीट पर पांचवीं बार महिला प्रत्याशी को उतारा था और अपने मिजाज के अनुरूप यमकेश्वर की जनता ने भी महिला प्रत्याशी पर विश्वास करते हुए रेनू बिष्ट को विधानसभा भेजा।
अब बात कुछ और सीटों की, जहां महिला उम्मीदवारों पर जनता भरोसा करती रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो केदारनाथ विधानसभा के मतदाताओं ने भी महिला प्रत्याशियों पर हर बार भरोसा जताया। भाजपा से आशा नौटियाल, कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों से से शैलारानी रावत इस सीट से विधायक रहीं। केदारनाथ से अपवाद स्वरूप 2017 में पुरुष प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस से मनोज रावत विधायक चुने गए। 2022 में भाजपा प्रत्याशी शैलारानी रावत चुनाव जीतती हैं और उनके निधन के बाद सत्ताधारी पार्टी ने नया प्रयोग करते हुए दिवंगत विधायक शैलारानी रावत के परिवार से दावेदारी कर रही उनकी बेटी ऐश्वर्या रावत को टिकट न देकर पूर्व विधायक आशा नौटियाल को ही मैदान में उतारा और उन्होंने जीत भी दर्ज की। इस तरह से 2017 को छोड़ दें तो पांच बार केदारनाथ की जनता ने महिला प्रत्याशियों पर ही विश्वास जताया।
हरिद्वार जिले की भगवानपुर सीट से कांग्रेस विधायक ममता राकेश भी 2022 में जीत की हैट्रिक लगा चुकी है लेकिन इससे पहले इस सीट पर उनके पति सुरेंद्र राकेश विधायक रहे थे। सुरेंद्र राकेश के निधन के बाद उपचुनाव के ज़रिए राजनीति में उतरने वाली ममता राकेश 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहीं। अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर सीट से धामी सरकार में मंत्री रेखा आर्य ने भी पिछले दो विधानसभा चुनावों में जीत का परचम लहराया है और उससे पहले यहीं से 2014 में सांसद बनने के बाद अजय टम्टा द्वारा सीट खाली करने से हुए उपचुनाव को भी फतह किया था।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक सुझाव है। मातृ शक्ति पर विश्वास जताने वाली यमकेश्वर सीट के भाजपा के हर बूथ अध्यक्ष को जरूर सम्मानित करना चाहिए। एक तो इस विधानसभा ने हर बार भाजपा पर विश्वास जताया जिसके लिए पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत को श्रेय जाता है; उस पर बार बार यहां चेहरा बदलने के बाद भी मातृ शक्ति को ही भाजपा ने चेहरा बनाया और मतदाताओं ने भी मातृ शक्ति पर ही भरोसा जताया। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक है)

