आत्मनिर्भर बनने के लिए किसान अपनाएं बिना MSP वाली फसलें: प्रो. रमेश चंद

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नई दिल्ली। नीति आयोग के सदस्य और कृषि अर्थशास्त्री प्रो. रमेश चंद ने किसानों से बिना न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) वाली फसलों की ओर जाने और कृषि योजना में समग्र खाद्य प्रणाली को महत्व देने का आह्वान किया है। आत्मनिर्भर भारत में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह जरूरी है। प्रो. चंद मीडिया प्लेटफॉर्म ‘रूरल वॉयस’ के पांच वर्ष पूरे होने पर मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित ‘रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड अवार्ड्स 2025’ को संबोधित कर रहे थे। कॉन्क्लेव को भारतीय कृषि जगत से जुड़ी कई शख्सियतों ने संबोधित किया।

नीति आयोग के सदस्य प्रो. चंद ने कहा कि कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की भूमिका अवश्य है, लेकिन क्या किसान अपने स्तर पर कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं जिनके लिए अभी उन्हें सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसा करने पर ही किसान आत्मनिर्भर हो सकेंगे। उन्होंने कहा कि एमएसपी वाली फसलों की ग्रोथ रेट पिछले एक दशक में 1.8 प्रतिशत रही जबकि बिना एमएसपी वाली फसलों की ग्रोथ 4 प्रतिशत के आसपास है।

उन्होंने कहा कि एक दशक में कृषि विकास दर 4.6 प्रतिशत रही, लेकिन घरेलू मांग दो फीसदी के आसपास बढ़ रही है। ऐसे में सरप्लस उत्पादन का क्या किया जाए। देश में एक संपन्न वर्ग बढ़ रहा है, जिसकी क्रय क्षमता अच्छी है। उनकी मांग के हिसाब से फसल उपजाने पर किसानों को कई गुना कीमत मिल सकती है। इसके लिए पूरी वैल्यू चेन विकसित करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया में कृषि योजना का आधार फूड सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। इसमें बीज से लेकर मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन समेत पूरी वैल्यू चेन को शामिल किया जाता है। वैल्यू चेन से जुड़ने पर आमदनी भी बढ़ती है।

रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने रूरल वॉयस के पांच वर्षों के सफर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि रूरल वॉयस को शुरू करने का मकसद सूचनाओं के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना था। यह कॉन्क्लेव इसी मकसद से आयोजित किया गया। अगर देश को आत्मनिर्भर बनाना है तो किसानों को सशक्त बनाना होगा। इसके लिए इनोवेशन, टेक्नोलॉजी, पॉलिसी की जरूरत है। साथ ही, किसानों को नीति निर्माण के केंद्र में लाना होगा।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और आईसीएआर (ICAR) के डायरेक्टर जनरल डॉ.एम.एल. जाट ने कहा कि विकसित भारत की कल्पना में आत्मनिर्भर किसान अहम हैं। उन्होंने इनोवेशन, स्पेशलाइज्ड फार्मिंग, स्किल डेवलपमेंट, मार्केट लिंकेज, सब्सिडी की जगह इन्सेंटिव और टेक्नोलॉजी तथा मार्केट ड्रिवन कृषि को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने कहा कि इनोवेशन किसान की उत्पादकता बढ़ाने और खर्च घटाने में मदद करेगा।

डॉ. जाट ने सब्सिडी की जगह इन्सेंटिव की व्यवस्था अपनाने की जरूरत बताई, क्योंकि सब्सिडी से किसानों की फसल चुनने की क्षमता कम होती है। उन्होंने कहा कि जिन किसानों की आय बढ़ रही है, वे डाइवर्सिफिकेशन कर रहे हैं या मार्केट से जुड़े हैं। हमें मार्केट ड्रिवन कृषि की ओर जाने की जरूरत है। स्पेशलाइज्ड फार्मिंग जोन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि फसल और क्षेत्र के हिसाब से जोन विकसित किए जाएं, वहीं फैक्ट्रियां और रिसर्च संस्थान हों तो किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत मिलेगी। तब उन्हें एमएसपी की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।

आईसीएआर प्रमुख ने रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए जैव-उर्वरकों को अपनाने के साथ मिट्टी, जैव-विविधता, पर्यावरण को संजोने की बात भी कही। टेक्नोलॉजी तो है लेकिन किसान तक नहीं पहुंच रहा है। इसलिए टेक्नोलॉजी टार्गेटिंग और स्किल डेवलपमेंट अहम है।

ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के चेयरमैन, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव एवं ICAR के पूर्व डायरेक्टर जनरल पद्मश्री डॉ.आर.एस. परोदा ने छोटी जोत वाले किसानों के हिसाब से नीतियां और रिसर्च की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता के लिए किसानों को भी विकल्प तलाशना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि हमारा एक्सटेंशन सिस्टम कमजोर है। कृषि से जुड़े मंत्रालयों की संख्या सात हो गई है। उनमें आपस में मिलकर काम करने का अभाव है। डॉ. परोदा के अनुसार, भारत की कृषि और किसान कल्याण के लिए एक नीति होनी चाहिए। किसानों की बात सुनने का भी एक माध्यम होना चाहिए। जरूरी नहीं कि जब किसान सड़क पर आएं तभी उनकी बात सुनी जाए। कृषि राज्य के अधिकार में भी आता है, इसलिए ऐसे मामलों में आपसी समन्वय की जरूरत है। उन्होंने जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर कृषि के लिए भी एक काउंसिल गठित करने का सुझाव दिया। उन्होंने भी सब्सिडी की जगह इन्सेंटिव की व्यवस्था लाने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को मजबूत करने का सुझाव दिया।

पूर्व केंद्रीय कृषि एवं खाद्य सचिव टी. नंदकुमार ने कृषि क्षेत्र में समग्र फूड सिस्टम अपनाने को जरूरी बताते हुए कई अहम सवाल उठाए। उन्होंने कहा, वर्ष 2047 में विकसित भारत की कल्पना में मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और सर्विसेज की बात तो बहुत की जा रही है। लेकिन इसमें कृषि और किसानों की क्या भूमिका होगी यह सवाल उठना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 16 प्रतिशत है और करीब 45 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। क्या इसे जीडीपी की तुलना में घटाकर 12 प्रतिशत पर ला सकते हैं और क्या 45 प्रतिशत लोग उस पर निर्भर रह सकेंगे। उन्होंने एक और अहम सवाल उठाते हुए कहा कि ज्यादातर किसानों की कुल आय का आधा भी फसल से नहीं आता है। उनकी आय बढ़ाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने की जरूरत है, वह कैसे होगा। उन्होंने जलवायु परिवर्तन का मुद्दा भी उठाया।

कृभको के वाइस चेयरमैन और इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस एशिया–प्रशांत के प्रेसिडेंट डॉ. चंद्रपाल सिंह ने कृषि में कोऑपरेटिव की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि आज पैक्स के माध्यम से किसानों को सही कीमत पर बीज और खाद उपलब्ध हो रहा है, सस्ता कर्ज मिल रहा है। किसानों की फसल खरीदने में भी पैक्स की भूमिका होती है। इफको, कृभको, नाफेड जैसे कोऑपरेटिव बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करने सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकारी योजनाओं के अमल के लिए भी कोऑपरेटिव को माध्यम बनाना चाहिए।

इस अवसर पर रूरल वॉयस अवार्ड्स का भी वितरण किया गया। एमिनेंट एग्री साइंटिस्ट कैटेगरी में आईएआरआई के पूर्व डायरेक्टर डॉ. अशोक कुमार सिंह, एग्री-कॉरपोरेट कैटेगरी में माहिको प्रा.लि. के चेयरमैन डॉ. राजेंद्र बरवाले और प्रोग्रेसिव किसान कैटेगरी में उत्तराखंड की निक्की पिलानिया चौधरी को सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर रूरल वर्ल्ड पत्रिका के पहले द्वैमासिक अंक का विमोचन भी हुआ। अब तक हर तीन माह में प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका अब हर दो माह में प्रकाशित होगी।

 

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