दुर्गाप्रसाद नौटियाल। हिमालय की वादियों में रची-बसी संस्कृति केवल मेलों और उत्सवों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह एक जीवित ‘देव-लोकतंत्र’ है। हाल ही में रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि मैं मकर संक्रांति के पावन पर्व पर प्रशासन और जन-आस्था के बीच जो टकराव देखने को मिल रहा है, वह एक गहरे आत्म-मंथन की मांग करता है। क्या फाइलें और नियम उस अटूट विश्वास से बड़े हो सकते हैं, जिसने सदियों से इस कठिन भूभाग में समाज को थामे रखा है?
पहाड़ का आदमी आज भी उस ‘दैवीय पुंज’ का साक्षी है, जिसे आधुनिक विज्ञान शायद ही कभी समझ पाए। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है; यह अनुभवजन्य सत्य है कि जब गांव में कोई विवाद होता है, कोई चोरी होती है या कोई लाइलाज बीमारी दस्तक देती है, तो पहाड़ का मानस थाने या अस्पताल से पहले अपनी ‘देव-डोली’ के पास जाता है। डोली और ढोल का वह संगम, उसकी वह दिव्य ‘थाप’ (स्पंदन) और कंपन न केवल विवादों का न्याय करता है, बल्कि व्याधियों का उपचार भी करता है। यह हमारी वह परंपरा है जिसे प्रशासन अक्सर ‘अंधविश्वास’ के चश्मे से देखने की भूल कर बैठता है।
उत्तरकाशी के माघ मेले की परंपरा को ही लीजिए। वहां साक्षात भगवान विश्वनाथ विराजमान हैं, लेकिन व्यवस्था का विधान देखिए कि मेले का उद्घाटन ‘कंडार देवता’ के हाथों ही होता है। यह इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि यह धरती देवताओं की है। इसी तरह अगस्त्यमुनि में अगस्त्य ऋषि ही एकमात्र सर्वोच्च सत्ता हैं। वहां न कोई जिलाधिकारी (DM) राजा है, न कोई मंत्री या संत्री। वे उस क्षेत्र के गुरु हैं, रक्षक हैं और सर्वोच्च धर्माधिकारी हैं। जब प्रशासन इस मर्यादा को भूलकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है, तो वह सीधे उस ‘पुंज’ पर प्रहार करता है जो करोड़ों लोगों की ऊर्जा का केंद्र है।
इस आस्था की व्याप्ति कितनी असीम है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहाड़ की कोई ‘ध्यांणी(बेटी) अगर दिल्ली, मुंबई या मद्रास के किसी कोने में मुसीबत में होती है, तो वह किसी नेता या अधिकारी को मदद के लिए नहीं पुकारती। उसके होठों पर अनायास अपने चौरंगी नाथ, नाग देवता या तामयार देवता का नाम आता है। “हे चौरंगी! रक्षा करना”—यह पुकार केवल शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा सेतु है जो सात समंदर पार भी उसकी रक्षा करता है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि उत्तराखंड की असली ताकत उसकी सड़कें या कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि यहाँ की डोली-ढोल संस्कृति और ऋषि परंपरा है। व्यवस्थापकों का काम व्यवस्था बनाना होना चाहिए, न कि उस ‘विश्वास’ को चुनौती देना जिसके दम पर पहाड़ का अस्तित्व टिका है। जब तक गंगा की धार और हिमालय की चोटियां मौजूद हैं, तब तक यहाँ ऋषियों और देवताओं की ही सत्ता सर्वोपरि रहेगी। प्रशासन को यह सत्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह जनता का सेवक हो सकता है, लेकिन इस देवभूमि का भाग्य विधाता केवल और केवल यहाँ के देवता ही हैं।
(लेखक डिजिटल बुक उत्तरवाणी के संपादक हैं। विचार निजी हैं।)

