युवा नेतृत्व: कसौटी पर भाजपा का भविष्य

उनकी पारी को इस नजरिए से भी देखा जाएगा कि वे मोदी-शाह के राजनीतिक आभामंडल में विलीन हो जाते हैं या फिर अपनी एक अलग छाप छोड़ने में भी समर्थ होते हैं।

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  • उनकी पारी को इस नजरिए से भी देखा जाएगा कि वे मोदी-शाह के राजनीतिक आभामंडल में विलीन हो जाते हैं या फिर अपनी एक अलग छाप छोड़ने में भी समर्थ होते हैं।

संपादकीय। 20 जनवरी को भारतीय जनता पार्टी के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जा रहे 45 वर्षीय नितिन नबीन पार्टी के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। निश्चित रूप से यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 से देश की सत्ता पर काबिज भाजपा के भीतर ‘पीढ़ीगत परिवर्तन’ और युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने की दृष्टि को साकार करता है। लेकिन, यह उपलब्धि नितिन नबीन के लिए आगे का रास्ता सुगम होने का संकेत नहीं, बल्कि एक ऐसी कठिन यात्रा की शुरुआत है जिसमें अनेक राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक चुनौतियां उनके लिए प्रतीक्षारत हैं। आज से ही उनकी पूर्ववर्ती अध्यक्षों जिनमें नितिन गडकरी, अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे दिग्गज नेताओं के नाम शामिल, से की जाने लगेगी। जीत के ट्रैक रिकॉर्ड से लेकर पार्टी के भीतर आवश्यक सांगठनिक बदलाव का वाहक तो बनना ही पड़ेगा, साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के विज़न को ग्रासरूट कार्यकर्ता तक डिलीवर करने की भरसक कोशिश भी करनी होगी। अध्यक्ष के तौर पर नबीन के कार्यकाल की पहली बड़ी परीक्षा इस साल में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव होंगे। चुनावी राज्यों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, और केरल में भाजपा की मौजूदगी या तो बहुत कमजोर है या फिर चुनौतीपूर्ण। जहां, पूर्वोत्तर के असम में भाजपा को सत्ता बचाए रखने के लिए कठिन परिश्रम करना होगा, वहीं उत्तर में भारी उभार के वावजूद
दक्षिण में आज भी पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती की दरकार है।कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए नबीन ने तमिलनाडु में 90 दिवसीय बूथ-स्तरीय अभियान शुरू करके उसी दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन द्रविड़ पॉलिटिक्स के गढ़ में केवल घर-घर जाकर समर्थन जुटाना ही काफी नहीं होगा। आने वाले दिनों में दक्षिण और पूर्वोत्तर के गठबंधन समीकरणों को संभालने के लिए उन्हें रणनीतिक सूझबूझ और स्थानीय नेतृत्व को विश्वास में लेना होगा।

2026 के चुनावी समर से निपटते ही भाजपा को कहीं अधिक कठिन परीक्षा के लिए 2027 के चुनावी राज्यों में दाखिल होना पड़ेगा। यहां अधिकतर राज्यों में पार्टी को अपनी सत्ता बचाने के लिए सियासी संग्राम लड़ना है। उसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, गोवा जैसे राज्यों में अपनी सरकार बचानी है तो पंजाब और हिमाचल प्रदेश में विरोधियों से सत्ता पाने को दो-दो हाथ करने होंगे। जबकि 2028 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे और नतीजे आते-आते लोकसभा चुनाव 2029 का बिगुल बज जाएगा। ज़ाहिर है नितिन नबीन के सामने चुनावी फ्रंट पर एक के बाद एक चुनौती होंगी लेकिन उनको ‘ब्रांड मोदी’ और ‘चाणक्य’ शाह का छांव भी मिलती रहेगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से तालमेल बनाने रखना होगा ही। जबकि 2027 की जनगणना के बाद लागू होने वाला 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बड़ा बदलाव लाएगा तो वहीं नई समस्याएं भी सामने आएंगी। सीटों का परिसीमन उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को बिगाड़ सकता है, तो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे कई पर्वतीय राज्यों में भी पहाड़ बनाम मैदान की लड़ाई को और बढ़ा सकता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कार्यान्वयन न केवल सीटों के क्षेत्रीय संतुलन पर असर डालेगा, बल्कि टिकट वितरण में भी भारी दबाव बनेगा। यदि महिला आरक्षण का लाभ केवल नेताओं के परिवारों की बहू-बेटियों तक सीमित रहा, तो इसका नैतिक और राजनीतिक नुकसान तय है। नबीन के सामने असली परीक्षा यह होगी कि वे जमीनी, सक्षम महिला नेतृत्व को कैसे तैयार करते हैं और संगठन में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी कैसे बढ़ाते हैं। यदि प्रधानमंत्री मोदी के ड्रीम प्लान ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय राजनीति की रणनीति ही बदल जाएगी। अलग-अलग चुनावों में मिलने वाले ‘समीक्षा के अवसर’ खत्म होंगे, और पार्टियों को एक साथ पूरे देश में चुनावी प्रबंधन करना होगा। इसके लिए संसाधन, कैडर, गठबंधन और प्रचार की नई रूपरेखा तैयार करनी होगी। नबीन को इस बड़े बदलाव के लिए पार्टी को पहले से तैयार करना होगा।2027 की जनगणना में जाति आधारित आंकड़े शामिल होंगे, जो राजनीतिक समीकरणों को फिर से परिभाषित कर सकते हैं। मोदी-शाह दौर में भाजपा ने पारंपरिक ‘ब्राह्मण-बनिया’ छवि से निकलकर अच्छी खासी तादाद में ओबीसी और दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का काम किया है, लेकिन जाति जनगणना के बाद सामाजिक न्याय की मांग और तेज हो सकती हैं। नितिन नबीन को अपने गृह राज्य बिहार के अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए पार्टी की समावेशी छवि को मजबूत करना होगा, साथ ही पारंपरिक वोट बैंक को भी साथ लेकर चलना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी का ‘एक लाख गैर-राजनीतिक परिवारों के युवाओं को लाने’ का सपना नबीन के कार्यकाल की सबसे बड़ी प्राथमिकता हो सकती है। लेकिन भाजपा के भीतर वरिष्ठ नेताओं की एक बड़ी संख्या अभी भी मौजूद है जिनमें से कई उन्हीं के कार्यकाल में मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बन सकते हैं। लिहाजा उनको वरिष्ठों का सम्मान करते हुए युवाओं को आगे लाने का संतुलन साधकर दिखाना होगा। साथ ही, जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ वॉर छेड़े हुए हैं और जब-तब चीन की चालबाजी भी परेशानी पैदा करती रहती हैं। नितिन नबीन को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन मुद्दों को लेकर पार्टी मंच से जनता व कार्यकर्ताओं के बीच स्पष्ट संदेश देना होगा। साफ़ है कि नितिन नबीन का कार्यकाल सिर्फ भाजपा के भविष्य का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के एक नए दौर का निर्धारण करेगा। उनके सामने चुनौतियाँ विशाल हैं, लेकिन अवसर भी उतने ही बड़े हैं। यदि वे युवा ऊर्जा, जमीनी संगठन और रणनीतिक दूरदर्शिता का सही मिश्रण बना पाए, तो भाजपा न सिर्फ 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए कहीं अधिक मजबूत होकर उभरेगी, बल्कि इस दौरान होने वाले विधानसभा चुनावों में भी पार्टी अपना प्रदर्शन कहीं बेहतर कर पाएगी। देखना दिलचस्प होगा कि नितिन नबीन अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे कठिन किलों को भेद पाने में मोदी-शाह के कितने मददगार साबित होते हैं। साथ ही, संघ और भाजपा के सहयोगी दलों के साथ उनका तालमेल कितना प्रभाव छोड़ना है यह भी अहम रहेगा। उनकी पारी को इस नजरिए से भी देखा जाएगा कि वे मोदी-शाह के राजनीतिक आभामंडल में विलीन हो जाते हैं या फिर अपनी एक अलग छाप छोड़ने में भी समर्थ होते हैं।

Pawan Lalchand, Editor in Chief, Adda Insider
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